उरई---------:( ब्यूरो रिपोर्ट भारतNews Nation24) उत्तर प्रदेश बुंदेलखंड जनपद जालौन इस बार भी जुलूस-ए-मुहम्मदी नहीं निकलेग। यह निर्णय जिला प्रशासन से बातचीत के बाद ही कमेटी ने लिया है। बताते चलें कि मुहम्मद साहब के 18 अक्तूबर को जन्मदिवस पर अंजुमन फिदायाने रसूल की जानिब से निकलने वाले जुलूस-ए-मुहम्मदी को जिला प्रशासन द्वारा कोविड गाइडलाइन का हवाला देते हुए 50-50 लोगों को अलग-अलग निकलने की इजाजत दी गई। तब जुलूस-ए-मुहम्मदी की कमेटी ने नामंजूर कर दिया। कमेटी का कहना है कि इस तरह जुलूस-ए-मुहम्मदी नहीं निकल सकता। जुलूस-ए-मुहम्मदी जब भी निकलेगा पूरी शान ओ शौकत के साथ निकलेगा। बैठक में संयोजक जमील अहमद कादरी, हाफिज मंजूर, कारी शमसुल कमर, शहर काजी शकील बेग, हाफिज फिरोज रहमानी, नसीरुद्दीन, आमीन खान, तौसीफ रहमानी आदि लोग मौजूद रहे।
इंसानियत के वास्ते पैगंबर- ए-इस्लाम ने लिया था जन्म
सद्भावना और एकता के प्रतीक थे मुहम्मद साहब
मुहम्मदाबाद- इस्लाम धर्म के प्रवर्तक हजरत मुहम्मद साहब की यौम ए पैदाइश पूरी दुनिया में अदब अहराम से मनाया जाता है। उनका जन्म 12 रबीउल अव्वल 571 ईस्वी पूर्व अरब देश के मक्का में हुआ था। इनका विशाल 12 रबीउल अव्वल 13 हिजरी में हुआ था। मुस्लिम धर्म के प्रवर्तक हजरत मुहम्मद हैं, जिन्होंने अपनी धार्मिक सहिष्णुता एवं श्रेष्ठ चारित्रिक गुणों से इस धर्म को महान धर्म के रूप में प्रतिष्ठित किया। मानवीय आधार पर इस्लाम धर्म की स्थापना करके उन्होंने आपसी सद्भाव का संदेश भी दिया है। उन्होंने लोगों को धार्मिक सद्भावना व एकता का पाठ पढ़ाया है। हजरत साहब के जन्मदिवस पर मजार, दरगाह और घरों को रंगबिरंगी झालरों और रोशनी से सजाया गया।
बचपन में ऐसे हुई देखभाल
खानकाह रहमानियां के साहिबे सज्जादानसीन हजरत मारूफ उर्रहमान साहब ने बताया हजरत मुहम्मद साहब के वालिद हजरत अब्दुल्लाह और वालिदा हजरत बीबी आमना थीं। जब वे दो महीने के थे तो उनके वालिद का विशाल (इंतकाल) हो गया था और उनकी वालिदा भी कुछ ही दिनों में चल बसी थीं। इसके बाद उनकी देखभाल दादा हजरत अब्दुल मुत्तलिक ने की। कुछ दिनों बाद उनका भी विशाल हो गया। अपने विशाल से पहले मुहम्मद साहब की जिम्मेदारी उनके चाचा हजरत अबू तालिब को सौंप दी, जिन्होंने प्रेमभाव से उनकी देखभाल की।
कुरीतियों का अंत, कायम की इंसानियत
हाफिज अंसार ने हदीस की रोशनी में बताया हजरत मुहम्मद साहब बचपन से ही गंभीर स्वभाव व कम और मीठा बोलने वाले थे। जबकि अरब के लोग दगा, फरेब व झूठ बोलने में अपना जीवन बिताते थे। उनकी सच्चाई को देखकर लोग उन्हें अल अमीन अर्थात सच्चा ईमानदार एवं सत्यव्रती कहते थे। उस समय स्त्रियों पर कई तरह के जुल्म और सितम हुआ करते थे। झूठ, फरेब, धोखे का बोलबाला था। लोग अंधविश्वासों में डूब थे। इन बुराइयों का अंत कर हजरत मुहम्मद साहब ने इंसानियत कायम की।
मौलाना कय्यूम का कहना है हजरत मुहम्मद साहब की यौम-ए-पैदाइश मुस्लिम आवाम को इस्लामिक तौर तरीकों एवं सरीअत के साथ मनाना चाहिए। जिसमें हर मोमिन को सिर पर टोपी जुलूस में नियत के साथ हाथ बांध कर एवं दरूद पाक और सलाम पेश करते हुए चलना अफजल है।
यतीमों की मदद को बढ़ाए हाथ
गहाजी सुल्तान ने बताया हजरत मुहम्मद साहब अमन चैन का संदेश देने वाले पैगम्बर-ए-इस्लाम थे। यौम-ए-पैदाइश पर अकीदतमंदों को गरीबों, मिस्कीनों, यतीमों और बेसहारों की मदद करना हुजूर की सुन्नतों में से एक है। ऐसा कोई काम न करें, जिससे कोई दुखी हो।
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