लखनऊ -------: (रिपोर्ट- जेपी द्विवेदी भारत News Nation 24) उत्तर प्रदेश आपके लिए पर्व आता होगा, आप खुश होते होंगे, आप त्योहार मनाते होंगे और बहुत खुश होते होंगे। हम यूपी बिहार के लोग खुश नहीं खुशमखुश होकर मनाते हैं छठ। यह हमारे लिए पर्व नहीं महापर्व है। आप दीपावली में 2-4 दिन पहले से तैयारी शुरू करते हैं और मना लेते हैं, हम लोग महीना भर से लगते हैं और तब जाकर मनता है महापर्व छठ। लड़का, आदमी लोग बाहर का काम देखता है तो अंदर माई भौजाई लोग। गूगल पर छठ के फोटो में आप केवल लोगों को पानी में खड़ा होते हुए देखे होंगे लेकिन आपकी जानकारी के लिए बता दें कि पानी के किनारे पर घाट बना होता है जो कम से कम एक महीना पहले से बनना शुरू हो जाता है, वहां का घास फूस साफ किया जाता है। लगभग हर रोज लीपा-पोता जाता है और पूजा किया जाता है।
घर के बाहर से ज्यादा मेहनत और महत्वपूर्ण काम है घर के अंदर का। कई दिन पहले से गेहूं धुलने और सुखाने का काम शुरू हो जाएगा। इस बात का खास ख्याल रखा जाएगा कि प्रसाद थोड़ा कम बने चलेगा लेकिन शुद्धता से कोई कंप्रोमाइज बिल्कुल भी नहीं चलेगा। शुद्धता का मतलब सौ परसेंट खरा। प्रसाद का जो भी सामान है या काम है उसे करने, छूने के लिए आपका नहाया होना बहुत जरूरी है. अगर आपने भोजन भी कर लिया तो नहाना पड़ेगा और अगर आपने मल, मूत्र विसर्जन किया है तो बिना कहे पूछे नहा लीजिएगा। और प्रसाद के सामान को गलती से भी चिड़िया चुरमुन जूठा नहीं करना चाहिए। जूठा प्रसादी छठी मैया को कैसे चढ़ेगा भाई। वो गाना नहीं सुने हैं. केरवा जे फरेला घवद से ओह पर सुग्गा मेडराय, मरबो रे सुगवा धनुष से, सुग्गा गिरे मुरझाए। तो इस महापर्व का प्रसाद भी एकदम शुद्ध होना चाहिए लेकिन एक बात पर गौर किया आपने, एगो सुग्गा प्रसाद का सामान झूठा कर दे उसे मार दिया जाए, ये कहां का न्याय है भाई। लेकिन आप उस गीत को पूरा और ध्यान से सुनिए, उस सुग्गे की पत्नी के सुहाग का, उसकी भावनाओं का भरपूर ख्याल रखा गया है। ऊ जे सुगनी जे रोएली वियोग से, सुग्गा काहे मारल जाए। पेटा, सेटा जीव संरक्षण वाले तो आज न पैदा हो गये, जनमानस न जाने कितने दशक पूर्व से जीवों के हक की बात करता आया है। ऊ जे सुगनी जे रोएली वियोग से, आदित होईं ना सहाय, देव होईं ना सहाय। अर्थात, हे सूर्य देव, आप उनकी भी रक्षा करें।
अब जब बात प्रसाद की निकली है तो ठेकुआ की बात ना हो तो कैसे चलेगा महाराज। ठेकुआ, नाम तो सुने होंगे। कोई भी यूपी बिहार का लड़का चाहे वह पढ़ने वाला हो या कमाने वाला, घर से लौट कर जाता है तो उसकी अम्मा एक मिठाई जरूर बना कर देती हैं। उस अप्रतिम मिठाई का नाम है ठेकुआ। जी हाँ, वही ठेकुआ इस महापर्व का महाप्रसाद बनता है, साथ में कचवनिआ, ईख, चना, गुड़, हल्दी, नारियल, संतरा, घाघर, अनानास और अन्य फल भी अपना भाग पाते हैं। आप अमीरी में बिलगेट्स को पीछे छोड़ दीजिए चाहे गरीबी में रमुआ कलुआ के पास आ जाइए। सबका प्रसादी एक ही होगा, समझ में नहीं आता है जात-पात, ऊंच-नीच के नाम पर समाज को बांटने वाले पैदा कैसे हो जाते हैं। अरे नीचों, एक बार छठ में जरूर आओ और पता कर के बताओ कि कौन ऊँचा है और कौन नीचा। छठ में गांव का बड़ा से बड़ा आदमी भी झुक कर प्रसाद मांगता हैं, छठ का व्रती लोग खुशी खुशी प्रसाद देता भी है और छठ के बिहान भईला पूजा समिति का एक ईंपोर्टेंट अनाऊंसमेंट होता है कि जिन भाईयों बहनों को प्रसाद न मिला वो आकर पूजा समिति से प्रसाद ले जाएं। वहां रखे प्रसाद पर कोई नाम नहीं लिखा होता, कौन ठेकुआ रजपुताईन देले है, कौन संतरा मिश्राईन देले है या फिर कुछ और... फालतू में बवाल काट देता है सब।
छठ एक लोक परंपरा का पर्व है और लोक, शास्त्रों से अधिक श्रुतियों पर चलता है हमारे ग्रंथों में 33 कोटि देवी देवताओं का वर्णन है, पर कोई भी प्रत्यक्ष रूप में दिखाई नहीं देता है। कुछ लोग देवी देवताओं से मुलाकात की बातें तो करते हैं पर यह अहसास केवल उन्हीं तक सीमित है। इन सभी बातों के विपरीत सूर्यनारायण जीवंत भी है और स्पष्ट दिखते भी हैं। संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए ऊर्जा के स्रोत तो हैं ही साथ ही साथ धरती पर दैनिक जीवन को नियंत्रित भी करते हैं। तो आदित्यनारायण को धन्यवाद ज्ञापन हेतु जो पर्व मनाया गया। उसे छठ नाम दिया गया यहां एक बात पर गौर कीजिएगा की संपूर्ण धरा धाम उगते सूर्य को नमस्कार करता है और डूबते सूर्य का तिरस्कार। लेकिन भोला भाला जनमानस उगने वाले से पहले, डूबने वाले को नमस्कार करता है। उगने वाले से पहले डूबनेवाले की पूजा करता है अरघ भी पहले डूबनेवाले ही देता है।
छठ लोकसहभागिता और मेलजोल का पर्व है। हमने घरों की चारदीवारी बनाकर जो दिलों की सीमाएं तय कीं, उसे तोड़ता है छठ। स्त्रियों ने नाक तक घूंघट काढ़ के, पर्दे के अंदर खुद को जब्त कर लिया, उन वर्जनाओं को ठोकर मारता है छठ। पूरा गाँव समाज घर से बाहर निकलता है और मिलकर इस पर्व को महा पावन करता है। अधिकांश पर्व या तो घरों में मनाए जाते हैं या फिर मंदिरों में। लेकिन सबको मिलाने वाला छठ, घर मंदिर से अलग नदी, तालाबों या जलाशयों के किनारे मनाया जाता है।
जनमानस किसी भी एक बात को स्वीकार करने, अपनाने में सदियों से लेकर दशकों तक का समय लेता है। आस्था का महापर्व छठ भी इससे अछूता नहीं रहा होगा। आज अमेरिका से लेकर दुनिया के तमाम शहरों में जो छठ मनाया जाता है वह कहीं प्रारंभ हुआ होगा, छठ को लेकर भी कई कहानियां प्रचलित हैं, कार्तिक शुक्ल पक्ष की षष्ठी को मनाए जाने के कारण इसका नाम छठ पड़ा। रामायण के अनुसार लंका विजय और रामराज की स्थापना के बाद भगवान श्री राम और मईया सीता ने सूर्य देव की उपासना की थी। महाभारत में सूर्यपुत्र कर्ण ने ये पूजा प्रारंभ की तो द्रौपदी ने अपने घऱ परिवार के दुखों के नाश के लिए सूर्य देव की उपासना की थी। एक कथा के अनुसार राजा प्रियंवद को संतान नहीं थी। महर्षि कश्यप ने पुत्रेष्टी यज्ञ करा कर पुत्ररत्न की प्राप्ती तो कराई पर पुत्र मृत पैदा हुआ। पुत्र शोक में राजा स्वयं प्राण त्यागने लगे, तब ब्रह्मदेव की मानस कन्या देवसेना ने छठपूजा के बारे में बताया, राजा ने छठ मैया की पूजा की और उनका पुत्र जीवित हो गया। एक कथा के अनुसार देवसेना अदिती ने सुर संग्राम में देवताओं के विजय हेतु छठी मईया की आराधना की, उनके तेजस्वी पुत्र के रूप में भगवान आदित्यदेव जन्में और असुरों पर विजय मिली। तब से ये पर्व चलन में आया और जहां ये पूजा की गई थी उस जगह का नाम देव पड़ा, जो कि आज के बिहार राज्य के औरंगाबाद शहर के पास स्थित है और जहाँ आज भी महाश्रद्धा के साथ सूर्य उपासना का पर्व मनाया जाता है। एक मान्यता यह भी है कि इक्ष्वाकु के पुत्र अयोध्या की निर्वासित राजा एल जो कि कुष्ट रोग से पीड़ित थे, एक बार देव के जंगलों में गए थे। जब उन्होंने यहाँ के पोखर में स्नान कर सूर्योपासना की तो उनका रोग ठीक हो गया। विज्ञान को आज पता चला होगा लेकिन हमारे पुरखों को पहले से पता था कि सूर्य की किरणों में रोग नाशक शक्तियां होती हैं। सूर्यदेव में गहरी आस्था का एक प्रमुख कारण ये भी है (कोरिया के काया दिला, अंहरा के अँखिआ, पूजा लिहीं ए दीनानाथ)। इसके बाद राजा एल ने वहाँ सूर्य मंदिर का निर्माण कराया। संस्कृति को नष्ट करने वाले आताताईयों ने क्या कुछ नहीं किया, देव का सूर्य मंदिर भी इससे अछूता नहीं है। औरंगजेब जब सारी मुर्तियों और मंदिरों को तोड़ता हुआ देव पहुंचा तो लोगों ने बहुत विनती की। ये हमारी आस्था का प्रतीक मंदिर है इसे न तोड़ा जाए। विनती से, प्रार्थना से देव पसीजते हैं दानव कहां। औरंगजेब ने हंसकर कहा, अगर सच में तुम्हारे भगवान हैं और उनमें कोई शक्ति है तो आज रात भर का समय देता हूं या तो इस मंदिर का मुख पश्चिम की ओर कर लो या फिर तोड़ने के लिए तैयार हो जाओ। लोगों ने, पुजारियों ने पूजा प्रारंभ की, रात भर प्रार्थना चली, सवेरे जब लोगों ने नेत्र खोला तो पाया की मंदिर का मुख पश्चिम की ओर ही है। आपने मंदिर या तो उत्तर की ओर या फिर पूरब की ओर देखा होगा लेकिन सूर्य का यह देव मंदिर पश्चिम की ओर मुख करके विराजमान है, ऐसी बातें लोगों की आस्था को और प्रगाढ़, प्रबल करती हैं।
अभी तक तो केवल छठ पर्व की उत्पत्ति की बातें हुईं। आईए छठ पर्व के उपासना के तौर-तरीकों पर भी नजर डालते हैं। आप गूगल इमेज की तस्वीरों या छठ की लोकप्रियता से इसे हल्के में न लीजिएगा, एक तो इसके नियम कठोर है ऊपर से यह कठिन तप भी मांगता है।
4 दिन तक चलने वाले इस तप की शुरुआत नहाए खाए से शुरू होती है, नाम से आप आराम से नहाना और मस्त खाना मत समझ लीजिए। शुद्ध तन मन से, नहा धो कर, पूजा पाठ करके चूल्हा चौका साफ किया जाएगा। उस चूल्हे पर निजूठ बर्तन इस्तेमाल किया जाएगा। निजूठ से मतलब है कि उस बर्तन को कभी जूठा न किया गया हो और कभी भी नमक का स्पर्श ना हुआ हो। आज के भोजन में लौकी की सब्जी अनिवार्य रूप से बनती है. अगला दिन खरना होता है। खरना का मतलब है खर उपवास। व्रती लोग दिन भर पानी तक नहीं पीते। शाम में घाट पर जाकर स्नान ध्यान करते हैं और खीर खाते हैं, भोजना और पानी से मुलाकात की यह आखिरी घड़ी है। इसके बाद छठ पर्व संपन्न होने तक भोजन पानी निषेध है। हम तो 1 दिन भोजन के बिना ना रह पाएँ। धन्य है वो लोग जो 4 दिन तक कठोर व्रत जीते हैं।
चलिए अब छठ के घाट पर चलते हैं, तनिक रूकिए महाराज, छठपूजा के सामान को घाट पर भी तो ले जाना है। जब माई भौजाई कहती होंगी न -- पहिना ना आलोक बाबू पियरीआ, दऊरा घाटे पहुंचाए.... तब तन-मन का रोवां गनगाना जाता होगा, मन श्रद्धा आ तन उमंग के सागर में चार डुबुकिआ लगा लेता होगा। फिर राह चलते कवनो बटोही पूछिए देता होगा, बहंगी केकरा ला जाए... और फिर माताजी से अंधे होने की उपाधि पाता होगा कि दिख नहीं रहा है सूरजमल की उपासना के लिए बहंगी जा रही है। ये जो घर से छठ घाट जाने का समय है ये अपने आप में लाजवाब होता है। जिनके घरों के सामने से सड़क गुजरती है वो लोग बड़े स्नेह सड़क साफ करते हैं, पानी से धोते हैं कि व्रतिओं को जरा सा भी तकलीफ न हो. जगह जगह तोरण द्वार बनाए जाते हैं, रंगोली बनाकर स्वागतम् लिखा जाता है। जिनकी मन्नतें पूरी होती हैं वो गाजे बाजे के साथ घाट तक जाते हैं तो कुछ लोग घाट तक दंड़वत करते हुए जाते हैं। आप बस एक मिनट के लिए अपने मन में कल्पना कीजिए कि एक व्रती दंड़वत करता हुआ घाट तक जा रहा है और उसके पीछे ना जाने कितने जाने अनजाने लोग उसे प्रणाम करने के लिए, उसकी चरणधूली माथे से लगाने के लिए इंतजार कर रहे हैं। मात्र थोड़े समय में ही ये दृश्य आपको श्रद्धा भाव से विभोर कर देगा।
रास्ते भर में लगे स्पीकरों पर बजते भक्ति गीत और साथ साथ चलती बहंगी, सूर्य देव की उपासना के लिए जा रही होती है। इस बहंगी में सबकुछ जोड़ा होगा (जोड़े जोड़े सुपवा चढ़ाईबो सूरजमल). मतलब कि सबकुछ दो की संख्या में होगा जैसे एक जोड़ा सूप, प्रसाद, पूजा का सामान जैसे पान,सुपाड़ी, नारियल, साठी का चावल, चना, हल्दी, सिंदूर,सुहाग का सामान ललका छापा, जलता हुआ दीपक आदि तो रहेगा ही साथ ही कांधे पर रखकर चलने भर ईख भी रहेगा. दऊरा, सूप घाट पर रख दिया जाएगा. माताएं-बहने गीत गाएंगीं। *उषाकाल* *संध्याकाल* में सूर्य नारायण के डूबते स्वरूप की पूजा की जाएगी और अर्घ्य दिया जाएगा। पूरा वातावरण भक्ति मय हो जाएगा। छठ की शाम को एक बार घाट पर जरूर होकर आईए. नस नस में एक नवीन उर्जा संचारित हो जाएगी। आज भी गांवों में रात भर घाट पर रुकने की परंपरा है जबकि शहरों में ये संभव नहीं है।अर्घ्य देने के बाद लोग घरों को लौट आते हैं, फिर अगले सुबह सूर्योदय से पहले घाट पर पहुंचते हैं।
अच्छा, सारा तीज त्यौहार किसी न किसी के निमित्त होता है। तीज,करवा चौथ पति के लिए किया जाता है,तो जीवीतिया संतानों के लिए,लक्ष्मी पूजा धन समृद्धि के लिए, तो सरस्वती पूजा ज्ञान के लिए लेकिन एक छठ पूजा है जिसकी निमित्तता सीमित नहीं है। (ए करेलू छठ बरतिया हो केकरा लागी)। घर परिवार में खुशहाली के लिए छठी मईया की पूजा की जाती है तो समृद्धि के उजास के लिए सूर्यनारायण को पूजा जाता है। स्वास्थ्य की मंगल कामनाएं सूर्यदेव से तो संतान और सुहाग की सलामती छठी मईया से मांगी जाती है। सुहाग से एक बात और याद आया, छठ में महिलाएं नाक से लेकर माथे तक सिंदूर भरती हैं। कभी सोचा है आपने, सिंदूर सुहाग का प्रतीक है. शुभ माना जाता है, पर आज इसे लंबा करने का कोई विशेष प्रायोजन और भी कोई कारण हो पता करने पर दो बातें सामने आईं, एक तो यह कि जितना लंबा सिंदूर उतनी ही लंबी पति की उम्र मांगी जाती है और दूसरा ये कि नारी का जो ललाट है वह पति पक्ष यानी ससुराल का प्रतीकात्मक स्वरूप है और नाक तक का भाग नईहर यानी बाबुल का प्रतीकात्मक स्वरूप। इन दोनों भागो पर सिंदूर लगाया जाता है नाक से लेकर माथे तक। मतलब कि हे छठी मईया नईहर से लेकर ससुराल तक समृद्धि और खुशहाली बनाए रखिएगा।
अगली सुबह घाट पर सूरज भगवान के आने की प्रतीक्षा हो रही है। छठ पर्व के सारे क्षणों में ये पल महसूस करने लायक होता है। ऐसे तो सूर्य देव रोज सुबह सुबह ही निकल आते हैं लेकिन इस दिन लगता है कि कितनी देर से आ रहे हैं। कहते हैं ना कि इंतजार का एक-एक पल सदियों के समान बीतता है, ठीक वैसा ही अनुभव होता है। 4 दिन का भूखा प्यासा व्रती जल में खड़ा हो सूर्य नारायण की जल्दी निकलने की प्रार्थना कर रहा होता है। आहो दीनानाथ जल बीच खाड़ बानी, काँपता बदनवा दर्शन दिहीं ए दीनानाथ....
रोजे रोजे उगेल फजिरहीं ए आदित काहे कईला आबेर...
ऊगा हो आदित्य मल भोरे बिनसरवा अरघ के रे बेरवा, पूजन के रे बेरवा हो ना....
भव के सागर पार निकालने वाले भगवान भास्कर, दुखियों के समस्त दुखों को हरने वाले दीनानाथ अपने उज्ज्वल स्वरुप में प्रकट होते हैं। लोग श्रद्धा विनत हो कर जोड़ प्रणाम करते हैं, पूजा अर्चनाएँ करते हैं। कोई प्रार्थना करता है तो कोई विशेष मन्नत माँगता है। समस्त संसार को निराकार भाव से प्रकाशमानन करनेवाले सबको खुशी खुशी आशीर्वाद देते हैं।
यहाँ से श्रद्धा का महापर्व समापन की ओर बढ़ चलता है। लेकिन एक मिनट रुकिए, अभी जो एक घटना होती है वो नई पीढ़ी को सीखाने के लिए बहुत महत्व की है। आज की सुबह सारे लोग चाहे उनके यहाँ छठ हुआ हो या नहीं, हाथ जोड़कर, याचक बन प्रसाद माँगते हैं और माताएँ बहनें जितना प्रसाद अपने घर के सदस्यों के लिए ले जाती हैं उससे दुगूना प्रसाद बाँट देती हैं. आप अस्सी साल के वृद्ध हों, मुखिया प्रधान हो झुक कर माँगिए और आप दादी अम्मा हों या नव विवाहिता सस्नेह आगे आकर प्रसाद दीजिए। आप अन्य पर्व त्योहारों में भी मिठाईयों का आदान- प्रदान करते हैं लेकिन ऐसा आप अपनी हैसियत और पहचान के हिसाब से करते हैं, लेकिन छठ ना हैसियत पूछता है न जान पहचान, बस एक श्रद्धा भाव से खड़े हो जाइये। छठ का यह भाव समझता हूँ कि इसे बाकी पर्व त्यौहारों से बहुत आगे ले जाकर खड़ा करता है, और समझता हूँ ये निस्वार्थ भाव हमारी अगली पीढ़ी तक जरूर पहुँचना चाहिए।
छठ की बात हो और छठ के गीतों की बात ना हो. ऐसा हो ही नहीं सकता. हर एक क्षण के लिए गीत बने हैं और उन्हें उतने ही श्रद्धा के साथ गाया भी जाता है. इन गीतों की सबसे बेहतरीन खूबी यह है कि आपके तन मन को भक्ति में करने के लिए काफी हैं. आप शारदा सिन्हा, भरत शर्मा व्यास, अनुराधा पौडवाल और छपरा की देवी का गीत सुन लीजिए. शरीर का रोआं न गनगना जाए तो कहिएगा. आजकल जो डीजे पर उछल कूद कर गाने बन रहे हैं उनकी बात नहीं कर रहा हूं मैं. शारदा जी का पिछले साल का गाना सुनना खुद सुन लीजिए पहिले पहिले छठ के बरतिया.....
साथ ही साथ सूर्यनारायण और छठी मैया से कामना है कि आपके घर में समृद्धि और खुशहाली का प्रकाश फैलाएं
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